सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर आवारा मवेशियों की बढ़ती घुसपैठ को गंभीर मुद्दा मानते हुए केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब तलब किया है। अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया और चार हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश उस जनहित याचिका पर दिया, जिसमें मांग की गई है कि हाईवे और एक्सप्रेसवे पर आवारा मवेशियों की आवाजाही रोकने के लिए एक समान राष्ट्रीय दिशा-निर्देश बनाए जाएं और उन्हें सख्ती से लागू किया जाए। याचिका ‘लॉयर्स फॉर ह्यूमन राइट्स इंटरनेशनल’ की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर आवारा पशुओं की मौजूदगी सड़क हादसों की बड़ी वजह बन रही है।
रात के सफर में मवेशी बन रहे खतरा
खासकर रात के समय और दुर्घटना संभावित हिस्सों में यह खतरा और बढ़ जाता है। ऐसे में अदालत से मांग की गई है कि राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर अनिवार्य फेंसिंग कराई जाए, ताकि मवेशियों की एंट्री रोकी जा सके। इसके अलावा याचिका में वैज्ञानिक तरीके से संचालित गौशालाओं और पशु आश्रय स्थलों की स्थापना की भी मांग की गई है। इसके लिए अलग से फंड तय करने की बात कही गई है, ताकि छोड़े गए या भटकते मवेशियों को सुरक्षित स्थान पर रखा जा सके।
पीड़ितों के लिए ‘नो-फॉल्ट कंपेंसेशन’
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि मवेशियों को अवैध रूप से छोड़ने वालों पर सख्त दंडात्मक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। याचिका में सड़क हादसों के पीड़ितों के लिए ‘नो-फॉल्ट कंपेंसेशन’ व्यवस्था बनाने की मांग भी की गई है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी हादसे में आवारा मवेशी वजह बनते हैं, तो पीड़ितों को बिना लंबी कानूनी प्रक्रिया के मुआवजा मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
1. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।
2. अदालत ने सभी पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा।
3. याचिका में हाईवे पर मवेशियों की घुसपैठ रोकने के लिए एक समान राष्ट्रीय गाइडलाइन बनाने की मांग उठी।
4. फेंसिंग, गौशालाओं की व्यवस्था, दंडात्मक कार्रवाई और पीड़ितों के लिए मुआवजा ढांचा तैयार करने की जरूरत पर जोर दिया गया।

